Thursday, April 25, 2013

दुविधा

मुझे

एक सा अचंभित करती हैं



अंधेरे का हर भेद

खोल के रख देने वाली

सूरज की निर्दयी धूप

या फिर

सिर्फ़ अपने होने का

कोमल आभास कराने वाली

जुगनू की टिम टिम रोशनी



दुविधा ये है

कि होने की चाह मे दोनो

मैं हो नही पाता हूँ

कुछ भी

Monday, October 1, 2012

पास मेरे है मेरा भोला-भाला सच




















काले चश्मों के भीतर है काला सच
छुपा लिया है सबने अपना वाला सच

शाम को भी क्यूँ आँख पे काले चश्मे हैं
फ़ैशन मे है दुनिया गड़बड़झाला सच


हर पल रंग बदलने वाला झूठ नही
पास मेरे है मेरा भोला-भाला सच


जिसने जैसा समझा वैसा मोड़ दिया
सबने अपने सांचो मे है ढाला सच

अपने छोटे छोटे स्वार्थ की खातिर ही
हमने,तुमने,सबने मिलकर टाला सच

झूठ है चढ़ बैठा दुनिया के मस्तक पर
पाँव के नीचे जैसे दुखता छाला सच

धज्जी धज्जी होकर चकनाचूर हुआ
न्यायालय मे जब भी गया उछाला सच

Wednesday, July 11, 2012

बेवजह ही वो गया मर, याद है अब तक

















खून मे लथपथ थे खंज़र, याद है अब तक
हू-ब-हू हमको वो मंज़र, याद है अब तक


आग मे जलते हुए घर, याद है अब तक
धूल के उड़ते बवंडर, याद है अब तक

हर कोई ज़िंदा था जो उसकी निगाहों मे
कांपता था ख़ौफ़ थर थर, याद है अब तक

दुधमुँहे को अपनी छाती से लगा करके
एक माँ दौड़ी थी दर दर, याद है अब तक

नफ़रतों ने क़ौम की जिसको जला डाला
पीढ़ियों के प्यार का घर, याद है अब तक

रहनुमा के कान मे जूँ तक नही रेंगी
हो गये थे खुदा पत्थर, याद है अब तक

दास्ताँ सरकार की जो फाइलों मे है
चीख थी उससे भयंकर, याद है अब तक

वो जो मंदिर मे भी,मस्जिद मे भी मिलता था
बेवजह ही वो गया मर, याद है अब तक


Tuesday, June 19, 2012

कोई कब तक भला उदास रहे




कोई कब तक भला उदास रहे
कोई अपना तो आस-पास रहे

कह सकें जिससे लगी इस दिल की
कोई तो इस क़दर भी खास रहे


कभी तो मुझपे मेहरबाँ हो तू
तेरी बातों मे भी मिठास रहे

इन अंधेरों मे ऊबता है मन
अब तो हो भोर,कुछ उजास रहे

कोई बुरा नही ऊँचा उड़ना
बस ज़मीनों का भी एहसास रहे

अर्ज़ इतनी कोई ना हो भूखा
ए खुदा सबके तन लिबास रहे

Thursday, May 17, 2012

ग़ज़ल

नींद गई उस देस सजनवा
गये हो तुम जिस देस सजनवा

राह तके पथराईं आँखें
लौटो अब इस देस सजनवा

बिरहा हमे डराये धरकर
अँधियारे का भेस सजनवा

अँसुवन संग धुँधलाई पाती
भेजो फिर संदेस सजनवा

रूठे पायल बिंदी बिछिया
कंगन काजल केस सजनवा

सौतन बन बैठा है हमरी
तुम्हरा ये परदेस सजनवा

Friday, May 11, 2012

पटरियाँ

जो है
और जो होना चाहिए
पटता नही है
उसके बीच का फ़र्क
हज़ार कोशिशों के बाद भी
रेल की दो समानांतर
पटरियों के फ़ासले सा

आदमी
अपने अथक प्रयासों से
देता है अपने वर्तमान को
एक मुश्किल मोड़
पहुँचने की आस मे
अपनी इच्छाओं के
ऐच्छिक बिंदु पर
और हर बार
ऐसा करने के बाद
जब वो देखता है अपनी स्थिति
तो पाता है
कि मुड़ चुकी है
इच्छाओं वाली पटरी भी
उतने ही कोण पर
बरकरार रखते हुए
प्राप्त और वांछित के बीच की
न्यूनतम निर्धारित दूरी को

क्या कभी मिल पाएँगी
जीवन की ये पटरियाँ

शायद तब तक नही
जब तक की
जीवन के आख़िर मे
मृत्यु की एक लंबवत रेखा
ख़त्म नही कर देती
इन पटरियों की
निरंतरता को.......

आइस पाइस






ये अजीब ज़्यादती है उसकी
नज़रों के इस खेल मे
हमेशा मुझे ही बनना पड़ता है
चोर
और इस खेल मे
कितनी माहिर है वो
ये तो आप
इस बात से ही समझ जाएँगे
कि जब भौतिक संसार के
हर कोने मे
बड़ी बड़ी आँखें करके
बदहवास सा ढूँढ रहा होता हूँ
उसे मैं
तभी वो
मन के एक कोने से निकलकर
अचानक मेरे सिर पर
मारती है टीप
मैं चोर का चोर ही बना रहता हूँ
और वो यूँ ही आज़ाद


कभी कभी यूँ ही
एक ख़याल उठता है मन मे
कि अगर कभी
मैं बैठ जाऊँ चुपचाप
और छोड़ दूँ उसे ढूँढना
(जो यूँ तो संभव नही असल मे)
तो क्या उसके मन मे भी
उठेगी ये ख्वाहिश
कि मैं किसी भी तरह
ढूँढ लूँ उसे
और बोल दूं
आइस पाइस