ये बोरियत
मुझ अकेले की नही है
बल्कि उन तमाम
इंसानों की है
जिनका मान इस वक़्त
उनके साथ नही है
जिनका मन
देह के ना जाने कौन से
भीतरी कोने मे जाके
दुबक गया है
जैसे कभी कभी
चिड़ियाघर का मंगल
(कानपुर के चिड़ियाघर के बनमानुष का नाम)
अपने बाड़े के भीतर
सुरक्षित स्थान मे चला जाता है
(जहाँ उसे खाना दिया जाता है)
देखने वाले
उसे बाहर बुलाने के लिए
तरह तरह के
प्रयत्न करते हैं
जैसे आवाज़ें करना
पत्थर फेंकना
(ये सब अपराध हैं,ध्यान रहे)
मगर खाना खाकर
सुस्ताते मंगल को
उठा पाना
इतना आसान नही होता
कुछ इसी तरह से
एक ओर मुँह करके
पसर गया है
मेरा मन
दिक्कत ये है
कि शरीर जाग रहा है
अब भी
बोरियत अलग है
दुख से
और कभी कभी
दुख से भयानक भी
बोर आदमी
ना तो किसी को याद करता है
और ना ही
उसे किसी की
याद ही आती है
बोरियत मे
शायद शिथिल हो जाता है
यादों के सिग्नल को
आदान-प्रदान करने वाला
सूचना-तंत्र
बोरियत
सुख और दुख के बीच की
एक ऐसी
भावहीन अवस्था है
जिसमे हम और आप
जैसे लोग
ज़्यादा देर नही रह सकते
हाँ,
पर कुछ महान लोग होते हैं
जो बोरियत की
इस अवस्था मे भी
घंटों,बगैर विचलित हुए
रह सकते हैं
उदाहरण के तौर पर
सरकारी दफ़्तर के वो बाबू
जिनका चश्मा
सीधी रेखा से
45 डिग्री का कोण बनाते हुए
फाइलों की ओर
झुका रहता है
उनके सामने आप
कितनी ही नाक रगड़ लो
मगर उनकी कलम
अघोषित तय दाम के
चुकता होने से पहले
आपके काग़ज़ पर
एक चींटी जितना भी
नही रेंगती
ये उनकी बोरियत के
स्थायित्व का
साक्षात उदाहरण है
बोरियत मे शायद
ख़त्म हो जाता है
''अचरज'' का भाव
अरे अरे ये क्या
मैने चार बातें क्या कह दी
आप तो मुझसे ही पूछने लगे
बोरियत को दूर करने का उपाय
अब आप ही बताइए
अगर मुझे मालूम होता
तो क्या मैं
ये कविता लिखने जैसा
बोर काम लेकर बैठता?
हाँ,लेकिन मेरा
एक फायदा तो हो गया
कविता का नाम सुनकर
मेरा मंगल जाग गया है
और अब बाड़े मे आकर
खूब करतब दिखा रहा है
मेरा तो काम हो गया
दोस्तों
माफ़ करना
आपको
खामख़ाँ
बोर कर दिया...........................