दिमाग़ के भीतर
गोल गोल घूम रही है
तेज़ रफ़्तार हवा
केन्द्र से निकलते हैं
विचारों के कंकड़
और फिर दौड़ने लगते हैं
परिधि पर जाकर
लहुलुहान हो गयी है
दिमाग़ की भीतरी सतह
अजनबी सोच के ये विचार
इतने अस्वाभाविक हैं
बाहरी दुनिया के लिए
कि अगर एक भी कंकड़
मुँह के रास्ते
जाता है बाहर
तो उसके जवाब मे
वापस आते हैं
सैकड़ों पत्थर
विचारों के भी
और असल के भी
(जिसके पास
जिस तरह का भी होता है
वो वही पत्थर
मरता है फेंक के)
बहुत तेज़
और नुकीले होते हैं
ये पत्थर
मस्तिष्क को फाड़ देने की
क्षमता रखने वाले
इसलिए मैं
ज़ोर से चिपका के रखता हूँ
अपने दोनो होंठों को
तुमने शायद
कभी गौर नही किया हो
मगर मेरे
बंद मुँह के भीतर
हमेशा पीछे की ओर
मुडी रहती हैं ज़बान
ये विचार
उत्पन्न होते हैं
मेरे ही भीतर
पर इन्हे उत्पन्न करने मे
मेरा कोई हाथ नही होता
(जान-बूझ कर तो
नही सोचता
मैं ये सब)
फिर भी कभी
अगर किया गया
इनका गौर से परीक्षण
तो निश्चित हैं
कि उनपर पाए जाएँगे
मेरी ही उंगलियों के निशान
इसलिए
डरा डरा रहता हूँ
हमेशा
अजनबी विचारों से
घायल हो रहा हूँ
खुद ही...................
Saturday, October 30, 2010
dhandhli
उस रात
बड़ी देर तक चली बैठक
चाँद और बाकी ग्रहों के बीच
सबकी आपत्तियों का
निवारण हो जाने के बाद
बैठक ने इस प्रस्ताव को
सर्व सहमति से पारित किया
की अमुक प्रेमी-प्रेमिका के
प्रणय जीवन मे
आख़िरकार मिलन का संयोग
आ गया है
और आज के दिन ही
उनके मिलने की
संपूर्ण व्यवस्था कराई जाए
तो चाँद ने
इस आशय की चिट्ठी लिखकर
सुबह होने से पहले
सूरज के दफ़्तर पहुँचा दी
और सारे लोग
बैठक के बाद
अपने अपने घर
विश्राम करने चले गये
(क्योंकि किसी भी
प्रेमी-प्रेमिका के
प्रणय जीवन मे
आने वाले कई दिनो तक
मिलन का संयोग नही था
इसलिए अगली बैठक की संभावित तारीख
कोई एक महीने बाद की निर्धारित हुई)
बड़े सुकून मे थे सब
सुबह हुई
तो सूरज ने दफ़्तर मे आने के साथ ही
दिन के प्रस्तावित कार्यों पर
एक सरसरी नज़र डाली
बहुत से और कामो के साथ
ये भी एक काम था
(प्रेमी-प्रेमिका को मिलवाने का
यही बस एक काम था
बाकी सब तो
धोखा दिलवाने,फूट पड़वाने
और जुदा करवाने के ही थे)
फिर भी खुश था सूरज
की कम से कम आज तो
कोई अच्छा काम करेगा वो
वरना ऐसे काम तो अब
छठे-छामासे ही मिलते हैं
कभी कभार
सूरज के लिए
ये कोई मुश्किल काम नही था
अपने इतने लंबे सेवा-काल मे
उसने ना जाने कितनी बार
अंजाम दिया था
ऐसे कामो को
तो उसने तैयार की रूपरेखा
इस कार्य के क्रियान्वयन की
और प्रेमी-प्रेमिका की
संभावित स्थितियों का पता देकर
उनकी ठीक ठीक स्थिति का
पता लगाने को कहा
धूप के दूतों को
धूप के दूतों ने
हर जगह तलाशा
जहाँ उनकी दखलंदाज़ी थी
वहाँ खुद ही
और जहाँ वर्जित था
उनका प्रवेश
वहाँ मदद की उनकी
अंधेरे के मुखबिरों ने
दिन-भर चलता रहा
यही सिलसिला
मगर तलाश ख़त्म होने का
नाम ही नही ले रही थी
धीरे धीरे करीब आ रहा था
सूरज के जाने का वक़्त
साफ साफ झलकने लगा था
उसके माथे पे पसीना
पहली बार
नाकाम होने जा रहा था सूरज
सूरज भी चाह रहा था ठहरना
मगर वक़्त को रोकना तो
उसके बस मे भी नही था
फिर शाम घिरने से
बस कुछ देर पहले
सूरज को दिखाई दिए वो
बहुत बड़ी हैरत ये
की अनुमान के विपरीत
दोनो एक साथ थे
समुद्र के किनारे
एक दूसरे का हाथ थामकर
चैन से लेटे hue
लाज़िम था
सूरज का आग-बबुला हो जाना
गुस्से से तमतमाया सूरज
जब उन्हे करीब से देखने के लिए
उनके ऊपर झुका
तो उसकी आँखें
फटी की फटी रह गयीं
कुछ ऐसा हो गया था
जो कभी नही हुआ था
उससे पहले
खबर के फैलते ही
पूरे तारा-मंडल मे
हड़कंप मच गया
पिछली रात समुद्र मे कूद कर
उन दोनो ने
जान दे दी थी अपनी
भाग्य के तय होने से भी पहले
खुद निर्धारित कर ली थी
अपनी नियती
बस फिर क्या
फिर वही हुआ
जो होता है आम-तौर पर
ऐसी घटनाओ के बाद
चाँद ने ग्रहों की
एक आपात बैठक बुलाई
सबने एक दूसरे पर गढ़े आरोप
की उन्होने
ठीक ठीक नही बताई
अपनी दशा
चंद्रमा ने शनि पर
शनि ने गुरु पर
तो गुरु ने किसी और पर
बड़ी देर तक चलता रहा
यही सिलसिला
अंततहा पूरे तारा-मंडल की
गरिमा का ध्यान रखते हुए
यही उचित समझा गया
की इस पूरे मामले को
किसी ना किसी तरह से
दबा दिया जाए
बस उसके बाद
दस्तावेज़ों मे की गयी फेरबदल
आग के हवाले कर दी गयी
सूरज को लिखी हुई चिट्ठी
और यम को
अपने साथ मिलाकर
उसके दफ़्तर मे रखवाया गया
एक दिन पहले की तारीख वाला
आदेश-पत्र
बस थोड़ी सी जद्दोजेहद से ही
पूरी तरह दब गया
इतना बड़ा मामला
मगर उस घटना के
चश्मदीद गवाह जानते हैं
की कितना कड़ा पहरा था उन पर
मगर मिलन की चाह
इतनी बलवती हो गयी थी
उनके भीतर
की उसने सारे पहरों को
धकेल दिया पीछे
इस घटना के बाद से
पूरी तरह तो नही
फिर भी कुछ हद तक
कमी आ गयी है
भाग्य के द्वारा
प्रेमी -प्रेमिकाओं के
प्रणय जीवन के साथ
की जाने वाली
ज़्यादतियों मे.............................
बड़ी देर तक चली बैठक
चाँद और बाकी ग्रहों के बीच
सबकी आपत्तियों का
निवारण हो जाने के बाद
बैठक ने इस प्रस्ताव को
सर्व सहमति से पारित किया
की अमुक प्रेमी-प्रेमिका के
प्रणय जीवन मे
आख़िरकार मिलन का संयोग
आ गया है
और आज के दिन ही
उनके मिलने की
संपूर्ण व्यवस्था कराई जाए
तो चाँद ने
इस आशय की चिट्ठी लिखकर
सुबह होने से पहले
सूरज के दफ़्तर पहुँचा दी
और सारे लोग
बैठक के बाद
अपने अपने घर
विश्राम करने चले गये
(क्योंकि किसी भी
प्रेमी-प्रेमिका के
प्रणय जीवन मे
आने वाले कई दिनो तक
मिलन का संयोग नही था
इसलिए अगली बैठक की संभावित तारीख
कोई एक महीने बाद की निर्धारित हुई)
बड़े सुकून मे थे सब
सुबह हुई
तो सूरज ने दफ़्तर मे आने के साथ ही
दिन के प्रस्तावित कार्यों पर
एक सरसरी नज़र डाली
बहुत से और कामो के साथ
ये भी एक काम था
(प्रेमी-प्रेमिका को मिलवाने का
यही बस एक काम था
बाकी सब तो
धोखा दिलवाने,फूट पड़वाने
और जुदा करवाने के ही थे)
फिर भी खुश था सूरज
की कम से कम आज तो
कोई अच्छा काम करेगा वो
वरना ऐसे काम तो अब
छठे-छामासे ही मिलते हैं
कभी कभार
सूरज के लिए
ये कोई मुश्किल काम नही था
अपने इतने लंबे सेवा-काल मे
उसने ना जाने कितनी बार
अंजाम दिया था
ऐसे कामो को
तो उसने तैयार की रूपरेखा
इस कार्य के क्रियान्वयन की
और प्रेमी-प्रेमिका की
संभावित स्थितियों का पता देकर
उनकी ठीक ठीक स्थिति का
पता लगाने को कहा
धूप के दूतों को
धूप के दूतों ने
हर जगह तलाशा
जहाँ उनकी दखलंदाज़ी थी
वहाँ खुद ही
और जहाँ वर्जित था
उनका प्रवेश
वहाँ मदद की उनकी
अंधेरे के मुखबिरों ने
दिन-भर चलता रहा
यही सिलसिला
मगर तलाश ख़त्म होने का
नाम ही नही ले रही थी
धीरे धीरे करीब आ रहा था
सूरज के जाने का वक़्त
साफ साफ झलकने लगा था
उसके माथे पे पसीना
पहली बार
नाकाम होने जा रहा था सूरज
सूरज भी चाह रहा था ठहरना
मगर वक़्त को रोकना तो
उसके बस मे भी नही था
फिर शाम घिरने से
बस कुछ देर पहले
सूरज को दिखाई दिए वो
बहुत बड़ी हैरत ये
की अनुमान के विपरीत
दोनो एक साथ थे
समुद्र के किनारे
एक दूसरे का हाथ थामकर
चैन से लेटे hue
लाज़िम था
सूरज का आग-बबुला हो जाना
गुस्से से तमतमाया सूरज
जब उन्हे करीब से देखने के लिए
उनके ऊपर झुका
तो उसकी आँखें
फटी की फटी रह गयीं
कुछ ऐसा हो गया था
जो कभी नही हुआ था
उससे पहले
खबर के फैलते ही
पूरे तारा-मंडल मे
हड़कंप मच गया
पिछली रात समुद्र मे कूद कर
उन दोनो ने
जान दे दी थी अपनी
भाग्य के तय होने से भी पहले
खुद निर्धारित कर ली थी
अपनी नियती
बस फिर क्या
फिर वही हुआ
जो होता है आम-तौर पर
ऐसी घटनाओ के बाद
चाँद ने ग्रहों की
एक आपात बैठक बुलाई
सबने एक दूसरे पर गढ़े आरोप
की उन्होने
ठीक ठीक नही बताई
अपनी दशा
चंद्रमा ने शनि पर
शनि ने गुरु पर
तो गुरु ने किसी और पर
बड़ी देर तक चलता रहा
यही सिलसिला
अंततहा पूरे तारा-मंडल की
गरिमा का ध्यान रखते हुए
यही उचित समझा गया
की इस पूरे मामले को
किसी ना किसी तरह से
दबा दिया जाए
बस उसके बाद
दस्तावेज़ों मे की गयी फेरबदल
आग के हवाले कर दी गयी
सूरज को लिखी हुई चिट्ठी
और यम को
अपने साथ मिलाकर
उसके दफ़्तर मे रखवाया गया
एक दिन पहले की तारीख वाला
आदेश-पत्र
बस थोड़ी सी जद्दोजेहद से ही
पूरी तरह दब गया
इतना बड़ा मामला
मगर उस घटना के
चश्मदीद गवाह जानते हैं
की कितना कड़ा पहरा था उन पर
मगर मिलन की चाह
इतनी बलवती हो गयी थी
उनके भीतर
की उसने सारे पहरों को
धकेल दिया पीछे
इस घटना के बाद से
पूरी तरह तो नही
फिर भी कुछ हद तक
कमी आ गयी है
भाग्य के द्वारा
प्रेमी -प्रेमिकाओं के
प्रणय जीवन के साथ
की जाने वाली
ज़्यादतियों मे.............................
इतवार
इतवार है आज
मोहल्ले भर मे हुई है
देर से सुबह
साठ से कम की उम्र का कोई भी
नही छोड़ना चाहता है बिस्तर
आठ से पहले
बच्चों को परियों के सपनो से
बदहवास सा उठाकर
उनके मुँह मे
नही ठूँसा जा रहा है
टूथब्रश
(आज इज़ाजत है उन्हे
परियों के साथ
आसमान मे
थोड़ा और दूर तक
उड़ आने की)
पतियों को दाढ़ी नही बनानी आज
(आज उन्हे अपने अफसरों को
नही दिखना है चेहरा
जो ढूँढते रहते हैं
दाढियों मे तिनके)
और पत्नियाँ
खिड़की मे सूरज चढ़ आने के
बावजूद भी
चादर से मुँह ढांपकर
अलसाने का
कर रही हैं नाटक
(नाटक इसलिए करना पड़ रहा है
क्योंकि अब तो उन्हे
सुबह साढ़े पाँच बजे उठने की
ऐसी आदत पद चुकी है
कि अलार्म का बजना
या ना बजना
गौण है)
बेवजह बिस्तर पर लेटे रहना
परिचायक है
आलस के मौजूद होने का
और पुराने ज़माने से ही
आलस हमेशा से रहा है
राजे रजवाड़ों की जागीर
(अब ग़रीब भला
कहाँ से खरीदेगा आलस)
तो इतवार की इस सुबह मे
सब पाल रहे हैं
अपने भीतर के
उस बचे खुचे आलस को
(जिसको की
बलि चढ़ाया जा चुका है
प्रगती और विकास की
बलिवेदी पर)
और ऐसा करने से
उनके भीतर जाग रहा है
राजा होने का भाव
इन सबके बीच
सिर्फ़ एक बाबू जी हैं
जो ना चाहते हुए भी
साठ पार करके
सेवानिवृत्त हो चुके हैं
तड़के सुबह जब वो
सैर से वापस आते हैं
तो अपने सामने
चाय का प्याला ना पाकर
उन्हे एहसास होता है
कि आज इतवार है
(रोज़ तारेख बताने वाला
अख़बार भी तो
लेट आता है
इतवार के दिन)
जैसे जैसे चढ़ता है दिन
वैसे वैसे कम होता जाता है
बचा हुआ इतवार
और उस घटते हुए इतवार मे
धीरे धीरे
उतरता जाता है
हमारी सोच के बदन से
राजसी लिबास
अगली सुबह होने तक
हम पूरी तरह से
तह करके
अलमारी मे रख चुके होते हैं उसे
और फिर से आ जाते हैं
राज दरबार मे खड़े
किसी अदने से मुलाज़िम की तरह
जी-हुज़ूरी की मुद्रा मे..............
मोहल्ले भर मे हुई है
देर से सुबह
साठ से कम की उम्र का कोई भी
नही छोड़ना चाहता है बिस्तर
आठ से पहले
बच्चों को परियों के सपनो से
बदहवास सा उठाकर
उनके मुँह मे
नही ठूँसा जा रहा है
टूथब्रश
(आज इज़ाजत है उन्हे
परियों के साथ
आसमान मे
थोड़ा और दूर तक
उड़ आने की)
पतियों को दाढ़ी नही बनानी आज
(आज उन्हे अपने अफसरों को
नही दिखना है चेहरा
जो ढूँढते रहते हैं
दाढियों मे तिनके)
और पत्नियाँ
खिड़की मे सूरज चढ़ आने के
बावजूद भी
चादर से मुँह ढांपकर
अलसाने का
कर रही हैं नाटक
(नाटक इसलिए करना पड़ रहा है
क्योंकि अब तो उन्हे
सुबह साढ़े पाँच बजे उठने की
ऐसी आदत पद चुकी है
कि अलार्म का बजना
या ना बजना
गौण है)
बेवजह बिस्तर पर लेटे रहना
परिचायक है
आलस के मौजूद होने का
और पुराने ज़माने से ही
आलस हमेशा से रहा है
राजे रजवाड़ों की जागीर
(अब ग़रीब भला
कहाँ से खरीदेगा आलस)
तो इतवार की इस सुबह मे
सब पाल रहे हैं
अपने भीतर के
उस बचे खुचे आलस को
(जिसको की
बलि चढ़ाया जा चुका है
प्रगती और विकास की
बलिवेदी पर)
और ऐसा करने से
उनके भीतर जाग रहा है
राजा होने का भाव
इन सबके बीच
सिर्फ़ एक बाबू जी हैं
जो ना चाहते हुए भी
साठ पार करके
सेवानिवृत्त हो चुके हैं
तड़के सुबह जब वो
सैर से वापस आते हैं
तो अपने सामने
चाय का प्याला ना पाकर
उन्हे एहसास होता है
कि आज इतवार है
(रोज़ तारेख बताने वाला
अख़बार भी तो
लेट आता है
इतवार के दिन)
जैसे जैसे चढ़ता है दिन
वैसे वैसे कम होता जाता है
बचा हुआ इतवार
और उस घटते हुए इतवार मे
धीरे धीरे
उतरता जाता है
हमारी सोच के बदन से
राजसी लिबास
अगली सुबह होने तक
हम पूरी तरह से
तह करके
अलमारी मे रख चुके होते हैं उसे
और फिर से आ जाते हैं
राज दरबार मे खड़े
किसी अदने से मुलाज़िम की तरह
जी-हुज़ूरी की मुद्रा मे..............
Friday, October 29, 2010
नमकीन
यूँ तुम्हारा दौड़ कर आके गले लगना
टूट कर फिर बिखर जाना बज्म मे मेरी
फिर छलक आते हैं जो इन आँख मे आँसू
ये नही आँसू,हैं तेरी प्रीत के छींटे
गर कभी छींटा कोई गिरता है होंठों पर
तब मैं चखता हूँ ज़रा सा स्वाद लहरों का
हाँ ज़रा नमकीन है पर ज़िंदगी सा है
टूट कर फिर बिखर जाना बज्म मे मेरी
फिर छलक आते हैं जो इन आँख मे आँसू
ये नही आँसू,हैं तेरी प्रीत के छींटे
गर कभी छींटा कोई गिरता है होंठों पर
तब मैं चखता हूँ ज़रा सा स्वाद लहरों का
हाँ ज़रा नमकीन है पर ज़िंदगी सा है
''कुछ नही''
ख़तरनाक है इस तरह होना
सारे ख्वाब,सारी ज़िम्मेदारियाँ
सब दूर बैठे हैं मुझसे
किसी का चेहरा साफ नही दिखता
प्रेम तो हमेशा ही रहता है नदारद
मेरी महफ़िलों से
हैरत ये कि आज
''प्रेम का अभाव'' भी नही आया
आज कोई नही आया यहाँ
मैं अकेला बैठा जूझ रहा हूँ
इस दोपहर की धूप से
दिमाग़ के भीतर भी
कुछ नही चलता
(कई बार सर झटकने के बाद भी)
अगर मैं चाहूं तो
मृत भी मान सकता हूँ
खुद को इस पल मे
ख़तरनाक है मेरे भीतर
इस "कुछ नही" का होना
ख़तरनाक है इस तरह होना
रूको,रूको
मुझसे दूर बैठी इन आकृतियों मे से
एक मे
अभी अभी हुई है हलचल
देखते हैं कौन सी बात तोड़ेगी
मेरे भीतर के इस ''कुछ नही'' के
सन्नाटे को
(शायद ये कुछ कुछ ताश के ढेर से
एक पत्ता उठाने जैसा है
मैं नही जानता कि वो बात
जो बढ़ रही है मेरी तरफ
वो क्या होगी............)
सारे ख्वाब,सारी ज़िम्मेदारियाँ
सब दूर बैठे हैं मुझसे
किसी का चेहरा साफ नही दिखता
प्रेम तो हमेशा ही रहता है नदारद
मेरी महफ़िलों से
हैरत ये कि आज
''प्रेम का अभाव'' भी नही आया
आज कोई नही आया यहाँ
मैं अकेला बैठा जूझ रहा हूँ
इस दोपहर की धूप से
दिमाग़ के भीतर भी
कुछ नही चलता
(कई बार सर झटकने के बाद भी)
अगर मैं चाहूं तो
मृत भी मान सकता हूँ
खुद को इस पल मे
ख़तरनाक है मेरे भीतर
इस "कुछ नही" का होना
ख़तरनाक है इस तरह होना
रूको,रूको
मुझसे दूर बैठी इन आकृतियों मे से
एक मे
अभी अभी हुई है हलचल
देखते हैं कौन सी बात तोड़ेगी
मेरे भीतर के इस ''कुछ नही'' के
सन्नाटे को
(शायद ये कुछ कुछ ताश के ढेर से
एक पत्ता उठाने जैसा है
मैं नही जानता कि वो बात
जो बढ़ रही है मेरी तरफ
वो क्या होगी............)
Saturday, October 2, 2010
बाढ़ के बाद
बाढ़ उतरने के बाद भी
वहीँ का वहीँ रहा
रोटी का सवाल
कुछ लोगों ने
यूँ ही
झूठी उम्मीद पाली थी
कि शायद
पानी के साथ
बह जायेगा
ये सवाल भी
मगर पानी तो
ढूंढ़ ढूंढ़ कर
जवाबों को बहा ले गया
अपने साथ
पानी में बह गयी फसल
जो जवाब थी
भूख का
बह गए कच्चे पक्के घर
जो जवाब थे
आंधी पानी धूप का
इस बाढ़ ने
सिर्फ जवाबों को बहाया है
सवाल तो
और भी हो गए हैं बड़े
पानी में फूल के..........
वहीँ का वहीँ रहा
रोटी का सवाल
कुछ लोगों ने
यूँ ही
झूठी उम्मीद पाली थी
कि शायद
पानी के साथ
बह जायेगा
ये सवाल भी
मगर पानी तो
ढूंढ़ ढूंढ़ कर
जवाबों को बहा ले गया
अपने साथ
पानी में बह गयी फसल
जो जवाब थी
भूख का
बह गए कच्चे पक्के घर
जो जवाब थे
आंधी पानी धूप का
इस बाढ़ ने
सिर्फ जवाबों को बहाया है
सवाल तो
और भी हो गए हैं बड़े
पानी में फूल के..........
Friday, September 10, 2010
seb
फलों की मण्डी से गुज़रते हुए
जब मुझे दिखी
सेबों की ठिलिया के ऊपर
लगे बल्ब में
चढ़ी लाल पन्नी
तो सहसा
मेरे दिमाग में ये ख्याल आया
क़ि इस पन्नी ने
भर दिया है
पूरे मंज़र को
एक बनावटीपन से
अब तो तुम
समझ ही गयी होगी
की मैं तुम्हे
क्यों mana करता हूं
अपने पहले से ही
लाल गालों पे
लाली मलने से
अब भला कश्मीरी सेबों को
(जिनके मुकाबले में कोई नहीं)
क्या ज़रुरत है
खुद को साबित करने के लिए
नकली लालिमा ओढने की...........
जब मुझे दिखी
सेबों की ठिलिया के ऊपर
लगे बल्ब में
चढ़ी लाल पन्नी
तो सहसा
मेरे दिमाग में ये ख्याल आया
क़ि इस पन्नी ने
भर दिया है
पूरे मंज़र को
एक बनावटीपन से
अब तो तुम
समझ ही गयी होगी
की मैं तुम्हे
क्यों mana करता हूं
अपने पहले से ही
लाल गालों पे
लाली मलने से
अब भला कश्मीरी सेबों को
(जिनके मुकाबले में कोई नहीं)
क्या ज़रुरत है
खुद को साबित करने के लिए
नकली लालिमा ओढने की...........
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