Friday, May 11, 2012
आइस पाइस
ये अजीब ज़्यादती है उसकी
नज़रों के इस खेल मे
हमेशा मुझे ही बनना पड़ता है
चोर
और इस खेल मे
कितनी माहिर है वो
ये तो आप
इस बात से ही समझ जाएँगे
कि जब भौतिक संसार के
हर कोने मे
बड़ी बड़ी आँखें करके
बदहवास सा ढूँढ रहा होता हूँ
उसे मैं
तभी वो
मन के एक कोने से निकलकर
अचानक मेरे सिर पर
मारती है टीप
मैं चोर का चोर ही बना रहता हूँ
और वो यूँ ही आज़ाद
कभी कभी यूँ ही
एक ख़याल उठता है मन मे
कि अगर कभी
मैं बैठ जाऊँ चुपचाप
और छोड़ दूँ उसे ढूँढना
(जो यूँ तो संभव नही असल मे)
तो क्या उसके मन मे भी
उठेगी ये ख्वाहिश
कि मैं किसी भी तरह
ढूँढ लूँ उसे
और बोल दूं
आइस पाइस
Thursday, May 3, 2012
सारे ख्वाब हमारे तेरी आँखों मे
सेहरा और मझधारे तेरी आँखों मे
दरिया मीठे खारे तेरी आँखों मे
उबर सका ना कोई इनमे जो उतरा
डूबे साहिल सारे तेरी आँखों मे
रोशन हो जाता है जग जब नैन खुलें
चंदा सूरज तारे तेरी आँखों मे
अंबर का विस्तार समाया है इनमे
उड़ते पंछी हारे तेरी आँखों मे
बिन इनके इक कदम भी चलना मुश्किल है
मेरे सभी सहारे तेरी आँखों मे
मेरे हर इक ख्वाब की मंज़िल हैं ये ही
सारे ख्वाब हमारे तेरी आँखों मे
मंदिर की हर गूँज अज़ानें मस्ज़िद की
गिरजा और गुरुद्वारे तेरी आँखों मे
दरिया मीठे खारे तेरी आँखों मे
उबर सका ना कोई इनमे जो उतरा
डूबे साहिल सारे तेरी आँखों मे
रोशन हो जाता है जग जब नैन खुलें
चंदा सूरज तारे तेरी आँखों मे
अंबर का विस्तार समाया है इनमे
उड़ते पंछी हारे तेरी आँखों मे
बिन इनके इक कदम भी चलना मुश्किल है
मेरे सभी सहारे तेरी आँखों मे
मेरे हर इक ख्वाब की मंज़िल हैं ये ही
सारे ख्वाब हमारे तेरी आँखों मे
मंदिर की हर गूँज अज़ानें मस्ज़िद की
गिरजा और गुरुद्वारे तेरी आँखों मे
Friday, March 2, 2012
गीता
पाप को पूजना
और पुण्य पर
पत्थर फेंकना
ये अँधा दौर
सिर्फ़ मुखौटों को पूजता है
धर्म बंदी है
धनवान की तिजोरी मे
डर जाता है
रात का तिमिर भी
मनुष्य के मन के
अंधकार को देखकर
बूढ़ा सूरज
अब भेद नही पाता
पाप पल रहा है
काले सायों से सराबोर
भूखी बस्तियों मे
हर मस्तिष्क मे
एक षड्यंत्र है
शासन अब
शुभचिंतक के नही
शैतान के हाथ मे है
और वो सब
जो दावा करते हैं
सत्ता का विकल्प बनने का
उनके भी हाथ
रंगे हुए हैं
रक्त से
ऐसी घनघोर कालिमा से ही तो
जनमते हो तुम
क्या ये ज़रूरी है
कि जब दुनिया
नष्ट होने की कगार पर हो
तभी रक्खो तुम पाँव
इस ज़मीन पर
हमे तुम्हारी ज़रूरत है कृष्ण
संसार की भटकती हुई
समझ को
फिर से सही दिशा मे
मोड़ने के लिए
हमे ज़रूरत है कृष्ण
एक नयी गीता की
और पुण्य पर
पत्थर फेंकना
ये अँधा दौर
सिर्फ़ मुखौटों को पूजता है
धर्म बंदी है
धनवान की तिजोरी मे
डर जाता है
रात का तिमिर भी
मनुष्य के मन के
अंधकार को देखकर
बूढ़ा सूरज
अब भेद नही पाता
पाप पल रहा है
काले सायों से सराबोर
भूखी बस्तियों मे
हर मस्तिष्क मे
एक षड्यंत्र है
शासन अब
शुभचिंतक के नही
शैतान के हाथ मे है
और वो सब
जो दावा करते हैं
सत्ता का विकल्प बनने का
उनके भी हाथ
रंगे हुए हैं
रक्त से
ऐसी घनघोर कालिमा से ही तो
जनमते हो तुम
क्या ये ज़रूरी है
कि जब दुनिया
नष्ट होने की कगार पर हो
तभी रक्खो तुम पाँव
इस ज़मीन पर
हमे तुम्हारी ज़रूरत है कृष्ण
संसार की भटकती हुई
समझ को
फिर से सही दिशा मे
मोड़ने के लिए
हमे ज़रूरत है कृष्ण
एक नयी गीता की
Monday, January 16, 2012
ताज़ा खबर है
ताज़ा खबर है
कि अब
कच्ची ही रहेंगी
बस्तियों की झोपड़ियाँ
क्योंकि रोक लेंगी
धूप का सारा रास्ता
हर तरफ फैलती हुई
ऊँची इमारतें
अब और भी होंगे पक्के
उनके रंग
सोखकर
ग़रीब बस्तियों के
हिस्से की धूप
ताज़ा खबर है
कि अब
ऊँची इमारतों की छत पर
खुदा की खातिर बनेगे
हैलीपैड
सुना है कि खुदा
अब पाँव नही करेगा मैले
धूल और कीचड़ से सनी
संकरी गलियों मे जाकर
ताज़ा खबर है
कि नयी व्यवस्था मे
अब कोई नही होगा
मसीहा
कमज़ोरों का
कि अब
कच्ची ही रहेंगी
बस्तियों की झोपड़ियाँ
क्योंकि रोक लेंगी
धूप का सारा रास्ता
हर तरफ फैलती हुई
ऊँची इमारतें
अब और भी होंगे पक्के
उनके रंग
सोखकर
ग़रीब बस्तियों के
हिस्से की धूप
ताज़ा खबर है
कि अब
ऊँची इमारतों की छत पर
खुदा की खातिर बनेगे
हैलीपैड
सुना है कि खुदा
अब पाँव नही करेगा मैले
धूल और कीचड़ से सनी
संकरी गलियों मे जाकर
ताज़ा खबर है
कि नयी व्यवस्था मे
अब कोई नही होगा
मसीहा
कमज़ोरों का
Tuesday, January 3, 2012
एक्सट्रा
ख्वाब की बहुमंज़िला इमारत मे
मैं जोड़ता रहता हूँ
और भी मंज़िलें
जब रात के झुरमुटे मे
ठंडी हवाओं के सहलाते हुए हाथ
मुझे ले जाते हैं
मन के भीतर की
उस दूसरी दुनिया मे
मगर दिन के उजाले मे
जब एक दस्तक पर
मैं खोलता हूँ आँखों का दरवाजा
तो वहाँ खड़ी होती है हक़ीक़त
हाथ मे एक
तेज़ धूप वाली टॉर्च लिए
कुछ पल लगते हैं
आँखों को
उस लगभग अँधा करती धूप का
आदी हो जाने मे
और उसके बाद
जब देखता हूँ गौर से
तो पड़ता है मालूम
कि हक़ीक़त अकेले नही आई है
बल्कि उसके साथ आए हैं
नगर निगम के उस दस्ते की तरह
बड़े बड़े बुलडोज़र
(अवैध निर्माण तोड़ने वाले)
बस फिर शायद
मिनट भर भी नही लगता
दिल पे हाथ रखकर
जब पीछे मुड़कर देखता हूँ
तो पता चलता है
कि मिट्टी मे मिल चुकी हैं
बहुमंज़िला इमारत की
बहुत सी मंज़िलें
और उसके बाद
थमाया जाता है एक नोटिस
मैडम हक़ीक़त के दस्तख़त वाला
''कि आपकी हद इतनी ही है''
बड़ी सख़्त हैं ये मैडम
अपने काम मे
बातचीत की
कोई गुंज़ाइश नही रखती
और हमे अपनी इमारत मे
एक ईंट भी नही लगाने देती
एक्सट्रा
मैं जोड़ता रहता हूँ
और भी मंज़िलें
जब रात के झुरमुटे मे
ठंडी हवाओं के सहलाते हुए हाथ
मुझे ले जाते हैं
मन के भीतर की
उस दूसरी दुनिया मे
मगर दिन के उजाले मे
जब एक दस्तक पर
मैं खोलता हूँ आँखों का दरवाजा
तो वहाँ खड़ी होती है हक़ीक़त
हाथ मे एक
तेज़ धूप वाली टॉर्च लिए
कुछ पल लगते हैं
आँखों को
उस लगभग अँधा करती धूप का
आदी हो जाने मे
और उसके बाद
जब देखता हूँ गौर से
तो पड़ता है मालूम
कि हक़ीक़त अकेले नही आई है
बल्कि उसके साथ आए हैं
नगर निगम के उस दस्ते की तरह
बड़े बड़े बुलडोज़र
(अवैध निर्माण तोड़ने वाले)
बस फिर शायद
मिनट भर भी नही लगता
दिल पे हाथ रखकर
जब पीछे मुड़कर देखता हूँ
तो पता चलता है
कि मिट्टी मे मिल चुकी हैं
बहुमंज़िला इमारत की
बहुत सी मंज़िलें
और उसके बाद
थमाया जाता है एक नोटिस
मैडम हक़ीक़त के दस्तख़त वाला
''कि आपकी हद इतनी ही है''
बड़ी सख़्त हैं ये मैडम
अपने काम मे
बातचीत की
कोई गुंज़ाइश नही रखती
और हमे अपनी इमारत मे
एक ईंट भी नही लगाने देती
एक्सट्रा
Thursday, October 20, 2011
मातृत्व
बचपन की धुंधली यादों मे से
एक याद ये भी है
कि गर्मी की रातों मे
घर की छत पर
जब हवा का जी नही होता था
बहने का
तो माँ अपने बगल मे लिटाकर
हमे हाथ वाले पंखे से
करती थी हवा
और बस कुछ ही देर मे
रूठी हुई नींद
फिर से बन जाती थी
हमारी दोस्त
यूँ तो हमेशा ही वो गहरी नींद
सुबह माँ के सहलाते हुए
हाथों से ही खुलती थी
मगर कभी कभार
जब आधी रात को
यूँ ही खुल जाती थी आँख
तो मैं देखता था
माँ की तरफ
मुंदी होती थीं माँ की आँखें
मगर फिर भी
माँ के हाथ का वो पंखा
हिलता रहता था हमारी ओर
माँ सो भी रही होती है जब
तो भी जागता रहता है
उसका मातृत्व
एक याद ये भी है
कि गर्मी की रातों मे
घर की छत पर
जब हवा का जी नही होता था
बहने का
तो माँ अपने बगल मे लिटाकर
हमे हाथ वाले पंखे से
करती थी हवा
और बस कुछ ही देर मे
रूठी हुई नींद
फिर से बन जाती थी
हमारी दोस्त
यूँ तो हमेशा ही वो गहरी नींद
सुबह माँ के सहलाते हुए
हाथों से ही खुलती थी
मगर कभी कभार
जब आधी रात को
यूँ ही खुल जाती थी आँख
तो मैं देखता था
माँ की तरफ
मुंदी होती थीं माँ की आँखें
मगर फिर भी
माँ के हाथ का वो पंखा
हिलता रहता था हमारी ओर
माँ सो भी रही होती है जब
तो भी जागता रहता है
उसका मातृत्व
Friday, September 23, 2011
दुनिया है बाज़ार समझ लो
जीवन का ये सार समझ लो
जीना है दुश्वार समझ लो
आँगन आँगन धूप क़ैद है
ऐसा ये संसार समझ लो
सीरत छुपी हुई है भीतर
सूरत के उस पार समझ लो
छुपा के रखना चोर बहुत हैं
आँखों के उजियार समझ लो
ख्वाब तुम्हे परखेगा पहले
तब होगा साकार समझ लो
दूर ही रखना आग की सच से
है कपूर सा प्यार समझ लो
वक़्त के पहले भरना बेहतर
छोटी अभी दरार समझ लो
पकड़ के रखना भव सागर मे
मन की ये पतवार समझ लो
ईमानों को बेच ना देना
दुनिया है बाज़ार समझ लो
जीना है दुश्वार समझ लो
आँगन आँगन धूप क़ैद है
ऐसा ये संसार समझ लो
सीरत छुपी हुई है भीतर
सूरत के उस पार समझ लो
छुपा के रखना चोर बहुत हैं
आँखों के उजियार समझ लो
ख्वाब तुम्हे परखेगा पहले
तब होगा साकार समझ लो
दूर ही रखना आग की सच से
है कपूर सा प्यार समझ लो
वक़्त के पहले भरना बेहतर
छोटी अभी दरार समझ लो
पकड़ के रखना भव सागर मे
मन की ये पतवार समझ लो
ईमानों को बेच ना देना
दुनिया है बाज़ार समझ लो
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