
बचपन की नींदें भी
कितनी मीठी हुआ करती थीं
आँखें मूंद लो तो पिछला सब गुम
और फिर एक
बिल्कुल नया ख्वाब उतरता था
रंग-बिरंगे होते थे जिसके पंख
जो काली नींद को
कभी लाल,कभी हरा
तो कभी
गुलाबी रंग दिया करते थे
आँखों के ऊपर
ऐसे मिंच जाती थी पलकें
कि बाहरी दुनिया की
एक भी चीज़
दाखिल नही हो पाती थी
हमारी ख्वाबगाह मे
ख्वाब के बाद
जब अगले रोज़
खुलती थी आँखें
तो गुज़रे दिन के
सारे तजुर्बो को
एक कोने मे समेटकर
दिमाग़ की तख़्ती
फिर से हो जाती थी ताज़ा
इस रोज़ के
नये तजुर्बो के
लिखे जाने के लिए
मगर जैसे जैसे
बढ़ी उम्र
ढीली पड़ती गयी
आँख से
पलकों की पकड़
और एक एक कर
सारी हक़ीक़तें
घुस गयीं भीतर
धीरे धीरे
पूरी ख्वाबगाह
दब गयी है
हक़ीक़त की
गर्द के नीचे
और अब तो
ये है आलम
कि खुली आँख से ही
सो जाते हैं हम
और बजता रहता है
हक़ीक़तों का शोर
हमारी नींद मे भी


