Wednesday, March 2, 2011

नींदें


बचपन की नींदें भी
कितनी मीठी हुआ करती थीं
आँखें मूंद लो तो पिछला सब गुम
और फिर एक
बिल्कुल नया ख्वाब उतरता था
रंग-बिरंगे होते थे जिसके पंख
जो काली नींद को
कभी लाल,कभी हरा
तो कभी
गुलाबी रंग दिया करते थे

आँखों के ऊपर
ऐसे मिंच जाती थी पलकें
कि बाहरी दुनिया की
एक भी चीज़
दाखिल नही हो पाती थी
हमारी ख्वाबगाह मे

ख्वाब के बाद
जब अगले रोज़
खुलती थी आँखें
तो गुज़रे दिन के
सारे तजुर्बो को
एक कोने मे समेटकर
दिमाग़ की तख़्ती
फिर से हो जाती थी ताज़ा
इस रोज़ के
नये तजुर्बो के
लिखे जाने के लिए

मगर जैसे जैसे
बढ़ी उम्र
ढीली पड़ती गयी
आँख से
पलकों की पकड़
और एक एक कर
सारी हक़ीक़तें
घुस गयीं भीतर

धीरे धीरे
पूरी ख्वाबगाह
दब गयी है
हक़ीक़त की
गर्द के नीचे

और अब तो
ये है आलम
कि खुली आँख से ही
सो जाते हैं हम
और बजता रहता है
हक़ीक़तों का शोर
हमारी नींद मे भी

Friday, February 25, 2011

देव आनंद (बॉलीवुड series)


उत्साह का
अथाह सोता है
तुम्हारे भीतर
जिसके सामने
खुद वक़्त भी
हो जाता है नतमस्तक
क्योंकि
तुम्हारी जीवंतता मे तो
वो भी नही पैदा कर सका
एक भी झुर्री

सिनेमा के उस छोर से
इस छोर तक
किसी गाइड की तरह
तुम्हारी उपस्थिति
जीने की जिजीविषा
पैदा करती है
हमारे भीतर

रुपहले पर्दे पर
अपने ही अंदाज़ मे
निभाए हुए
तुम्हारे किरदारों को देखना
हर बार
भर जाता है हमे
आनंद से भरपूर
अनुभवों से

जीवन के
इस अथक प्रेम पुजारी
देव आनंद साहब को
मेरा सलाम

Wednesday, February 23, 2011

मधुबाला(१४/०२/१९३३-२३/०२/१९६९) (बॉलीवुड series)


यूँ तो
हर तरह की भूमिकाएँ
की हैं तुमने
मगर इतने दशकों बाद भी
तुम्हारी जो तस्वीर
अभी तक बूढ़ी नही हुई
और ज़िंदा है
हमारी याददाश्त मे
अपने चिर यौवन के साथ
वो तुम्हारे
होंठों के कोनो से
छलकती हुई
मुस्कान की है

तमाम रंग और तकनीकें
जो ईज़ाद हुए
तुम्हारे जाने के बाद
वो सब
पड़ जाते हैं फीके
तुम्हारी एक
भरपूर ब्लॅक एंड व्हाइट
मुस्कान के आगे

Monday, February 21, 2011

ट्रॅजिडी क्वीन (बॉलीवुड series)


चेहरा उसका था
और आँसू
किरदार के
किरदार से उसका
कोई ज़ाती रिश्ता नही था
मगर शायद
आँसुओं से था
क्योंकि जब भी
उसकी आँख मे
चमकते थे आँसू
तो फिर चाहे
किसी भी किरदार के हों
मगर बिल्कुल
उसके खुद के लगते थे

कुछ ऐसा था जादू
ट्रॅजिडी क्वीन
मीना कुमारी का

Saturday, January 15, 2011

है बावरा ये मन तो पानी कभी धुआँ है

ये दिल है की शैतां है
पागल है परेशां है

बहता है तो दरिया है
उड़ता है तो तूफान है

होता है कभी गुम तो
मिलता नही कहाँ है

खुद मे समेट रखा
इसने ये सब जहाँ है

जलता है इस तरह कि
होता नही धुआँ है

जो आ गया किसी पे
तो उसपे मेहरबाँ है


जो रूठ गया तो फिर
मुश्किल मे समझो जाँ है

नाराज़ हो तो सहरा
खुश हो तो गुलिस्ताँ है

जो गिर गया वो जाना
गहरा बड़ा कुआँ है


पगली सी इसकी बातें
पगली सी इक जुबां है

करना ना तुम भरोसा
पछताओगे जुआँ है

है बावरा ये मन तो
पानी कभी धुआँ है

Monday, December 6, 2010

सौतने

ख्वाब से हंस बोल लो कुछ पल
तो हकीक़त रूठ जाती है
और हकीक़त के साथ बिताए हुए पल
ख्वाब की आँखों मे
चुभ जाते हैं
दोनो को फूटी आँख नही सुहाती
एक दूसरे की सूरतें
दोनो सौतनें जो ठहरीं
हालाँकि मैं
दोनो को ही देता हूँ
बराबर का वक़्त
फिर भी बराबर बनी रहतीं हैं
दोनो की शिकायतें

कभी कभी
जब दोनो से ही दूर
आँख लग जाती है मेरी
तो आँख खुलने पर
दोनो एक दूसरे के बाल खींचकर
झगड़ती हुई मिलती हैं
कभी ख्वाब के होंठ से
बहता है खून
तो कभी हकीक़त के माथे से
ज़ाहिर है
कि मेरी शर्ट के बटन तो
टूटते ही हैं
इस सबमे
ज़िंदगी
पूरी तरह से
अस्त व्यस्त फैल जाती है
दिमाग़ के कमरे मे

सच मे
ज़िंदगी कितनी खुशरंग हो जाएगी
अगर कभी ये सौतने
गले लग जाएँ
एक दूसरे के

Wednesday, November 3, 2010

अपवाद

पता नही कैसे हुआ ये
मेरी ही लापरवाही थी शायद
कि हवा के एक तेज़ थपेड़े मे
वक़्त की उंगली छूट गयी मुझसे
फिर जो गुम हुआ
तो आज तक नही ढूँढ पाया
खुद को
वक़्त अब बहुत दूर निकल गया है
इतना की मैं अब उसकी
परछाईं भी नही छू पाता
दौड़ूँ तो भी
उस तक पहुँच पाने मे
संदेह होता है
वो सब जिन्होने
मेरे साथ शुरू किया था
अपना सफ़र
वो अब भी चल रहे हैं
वक़्त के साथ
कदम-ताल करते हुए
उनके चेहरों पर उग आई हैं
अनुभवों की दाढ़ी मूछें
उन्होने सीख लिए हैं
इस दुनिया के बाज़ार मे
खुद को स्थापित किए रखने के लिए
ज़रूरी हथकंडे

पता है
जब वक़्त की उंगली छूटी थी मुझसे
तब तक वो सिखा चुका था
मानवता के मूल नैतिक नियम
और मैने कंठस्थ भी कर लिए थे
सब के सब
मगर जीने के लिए
सिर्फ़ इतना जान लेना ही तो
काफ़ी नही था
ज़रूरी था
उन सारे अपवादों को जानना
जो वक़्त ने उंगली छूटने के बाद
बाकी सब को सिखाए थे
ये वो अपवाद हैं
जो ज़रूरत पड़ने पर
मानवता के
समस्त मूल नैतिक नियमों को
खारिज कर देते हैं..............