जीवन का ये सार समझ लो
जीना है दुश्वार समझ लो
आँगन आँगन धूप क़ैद है
ऐसा ये संसार समझ लो
सीरत छुपी हुई है भीतर
सूरत के उस पार समझ लो
छुपा के रखना चोर बहुत हैं
आँखों के उजियार समझ लो
ख्वाब तुम्हे परखेगा पहले
तब होगा साकार समझ लो
दूर ही रखना आग की सच से
है कपूर सा प्यार समझ लो
वक़्त के पहले भरना बेहतर
छोटी अभी दरार समझ लो
पकड़ के रखना भव सागर मे
मन की ये पतवार समझ लो
ईमानों को बेच ना देना
दुनिया है बाज़ार समझ लो
Friday, September 23, 2011
Saturday, August 20, 2011
गाँधी टोपी वाले एक सिपाही ने
किसने नींद उड़ाई दिल्ली वालों की
गाँधी टोपी वाले एक सिपाही ने
किसने अलख जगाई कुछ कर जाने की
गाँधी टोपी वाले एक सिपाही ने
अपने प्यारे भारत की बुनियादों मे
पनप रही है दीमक भ्रष्टाचारों की
लेकिन एक हज़ारे की आवाज़ों पर
जुट आई है देखो भीड़ हज़ारों की
किसने छोड़ के फूलों का पथ इच्छा से
देश की खातिर राह चुनी अंगारों की
गाँधी टोपी वाले एक सिपाही ने
गाँधी टोपी वाले एक सिपाही ने
पिरो दिया है एक सूत्र मे भारत को
इससे पहले तो बस सबने बाँटा है
भाँति भाँति के भेदभाव मे भारत को
किसने दिखा दिया कि गर हम एक हों तो
तोड़ नही सकता है कोई भारत को
गाँधी टोपी वाले एक सिपाही ने
चेहरे पर मुस्कान है जिसके सच्ची सी
मन मे एक विश्वास बड़ा ही पुख़्ता है
देश की हालत देख के जिसके सीने मे
दर्द बड़ा ही गहरा कोई उठता है
किसने अपनी करनी से ये दिखा दिया
सत्य अहिंसा से पर्वत भी झुकता है
गाँधी टोपी वाले एक सिपाही ने
किसने नींद उड़ाई दिल्ली वालों की
गाँधी टोपी वाले एक सिपाही ने
किसने अलख जगाई कुछ कर जाने की
गाँधी टोपी वाले एक सिपाही ने
Wednesday, August 17, 2011
गुलज़ार
तुमने
एक पूरा बगीचा
उगाया हुआ है
अपने भीतर
अपनी बागवानी से
पैदा की हैं
फूलों की नयी नयी किस्में
जादू है तुम्हारे हाथों मे
जो हर बार
फूलों मे
नया रंग भर देता है
कौन सा पानी देते हो इन्हे
कैसी है वो मिट्टी
जहाँ पनपते हैं
ये फूल
तुम
जो भी लिख देते हो
वो फूल सा महकने लगता है
और उसकी वो महक़
इतनी ख़ास होती है
हमारे लिए
कि दुनिया भर के
इत्र
फीके पड़ जाते हैं
उस महक़ के आगे
हो भी क्यूँ ना
सुखन के गुलों के
बादशाह हो तुम
बाकी सब तो सब हैं
मगर गुलज़ार हो तुम
किसी रोज़
अपने बगीचे के
किसी भी पौधे से
एक कलम काटकर
मेरे भी सीने मे
बो देना............
(GULZAR SAAB KO JANMDIN KI BAHUT BAHUT BADHAI)
Tuesday, August 9, 2011
ग़ज़ल
आरज़ूएँ तमाम करता है
मन भी कैसा गुलाम करता है
ख्वाब लाता है हर इक रोज़ नये
सुक़ूँ का क़त्ल-ए-आम करता है
बात जब भी करे तो चिंगारी
गुफ़्तगू कब ये आम करता है
हमे तो पूछता नही दिन भर
वो जो आएँ सलाम करता है
मेरी आँखों से चुराकर नींदें
जाने किस किस के नाम करता है
गर कभी मुश्किलों मे हो जाँ तो
रात दिन राम राम करता है
मन भी कैसा गुलाम करता है
ख्वाब लाता है हर इक रोज़ नये
सुक़ूँ का क़त्ल-ए-आम करता है
बात जब भी करे तो चिंगारी
गुफ़्तगू कब ये आम करता है
हमे तो पूछता नही दिन भर
वो जो आएँ सलाम करता है
मेरी आँखों से चुराकर नींदें
जाने किस किस के नाम करता है
गर कभी मुश्किलों मे हो जाँ तो
रात दिन राम राम करता है
Tuesday, July 26, 2011
मगर सूरज चाय नही पीता
हम तो उठते ही
सुबह सुबह पी लेते हैं चाय
करने के लिए दूर
रात की खुमारी को
मगर सूरज
चाय नही पीता
तो जानती हो
वो कैसे भगाता है
अपनी अधखुली आँखों से
बची-खुची नींद को
उठने के साथ साथ
वो सबसे पहले चूमता है
तुम्हारा माथा
अब समझ आया
कि अभी जब
सुस्ता ही रहा होता है
अंधेरा
मोहल्ले के बाकी घरों मे
तो कैसे तुम्हारी खिड़की पर
खेलने लगती हैं
ऊषा की किरणें
क्योंकि
तुमसे ही पाता है
सूरज
अंधकार से
लड़ने की ऊर्जा
सुबह सुबह पी लेते हैं चाय
करने के लिए दूर
रात की खुमारी को
मगर सूरज
चाय नही पीता
तो जानती हो
वो कैसे भगाता है
अपनी अधखुली आँखों से
बची-खुची नींद को
उठने के साथ साथ
वो सबसे पहले चूमता है
तुम्हारा माथा
अब समझ आया
कि अभी जब
सुस्ता ही रहा होता है
अंधेरा
मोहल्ले के बाकी घरों मे
तो कैसे तुम्हारी खिड़की पर
खेलने लगती हैं
ऊषा की किरणें
क्योंकि
तुमसे ही पाता है
सूरज
अंधकार से
लड़ने की ऊर्जा
Sunday, June 26, 2011
ग़ज़ल
होश की देहरी पार हुई कब क्या मालूम
उनसे आँखें चार हुई कब क्या मालूम
जिस सूरत पर मर बैठे हम क्या जानें
क्या थे उसके ज़ात-ओ-मज़हब क्या मालूम
यूँ तो याद नही आता है गुनाह कोई
रूठ गया क्यों मुझसे वो रब क्या मालूम
याद है बस इतना कि तू था ख्वाबों मे
कैसे गुज़री रात कहाँ कब क्या मालूम
चैन की नींदें होश के छींटें और सुकून
कैसे उसने लूटा ये सब क्या मालूम
धुन जब लागी यार से जाके मिलने की
कैसे दरिया पार हुआ कब क्या मालूम
उनसे आँखें चार हुई कब क्या मालूम
जिस सूरत पर मर बैठे हम क्या जानें
क्या थे उसके ज़ात-ओ-मज़हब क्या मालूम
यूँ तो याद नही आता है गुनाह कोई
रूठ गया क्यों मुझसे वो रब क्या मालूम
याद है बस इतना कि तू था ख्वाबों मे
कैसे गुज़री रात कहाँ कब क्या मालूम
चैन की नींदें होश के छींटें और सुकून
कैसे उसने लूटा ये सब क्या मालूम
धुन जब लागी यार से जाके मिलने की
कैसे दरिया पार हुआ कब क्या मालूम
Sunday, March 27, 2011
जीवन-चक्र
होश एक कीड़ा है
और नींद छिपकली
मौका पाते ही
निगल जाती है
चट से
मगर कभी कभी
जब होश पी लेता है
तुम्हारी याद
तो बिचारी छिपकली
लाख पैतरों के बावज़ूद
छू भी नही पाती
उस कीड़े की परछाईं को
सुबह होने तक
भूख से तड़प कर
दम तोड़ चुकी होती है
बिचारी छिपकली
कभी कभी
मुझे डर लगने लगता है
कि कहीं तुम्हारी याद
फेरबदल ना कर दे
होश,नींद और मेरे
जीवन-चक्र मे
और नींद छिपकली
मौका पाते ही
निगल जाती है
चट से
मगर कभी कभी
जब होश पी लेता है
तुम्हारी याद
तो बिचारी छिपकली
लाख पैतरों के बावज़ूद
छू भी नही पाती
उस कीड़े की परछाईं को
सुबह होने तक
भूख से तड़प कर
दम तोड़ चुकी होती है
बिचारी छिपकली
कभी कभी
मुझे डर लगने लगता है
कि कहीं तुम्हारी याद
फेरबदल ना कर दे
होश,नींद और मेरे
जीवन-चक्र मे
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