तुमने
एक पूरा बगीचा
उगाया हुआ है
अपने भीतर
अपनी बागवानी से
पैदा की हैं
फूलों की नयी नयी किस्में
जादू है तुम्हारे हाथों मे
जो हर बार
फूलों मे
नया रंग भर देता है
कौन सा पानी देते हो इन्हे
कैसी है वो मिट्टी
जहाँ पनपते हैं
ये फूल
तुम
जो भी लिख देते हो
वो फूल सा महकने लगता है
और उसकी वो महक़
इतनी ख़ास होती है
हमारे लिए
कि दुनिया भर के
इत्र
फीके पड़ जाते हैं
उस महक़ के आगे
हो भी क्यूँ ना
सुखन के गुलों के
बादशाह हो तुम
बाकी सब तो सब हैं
मगर गुलज़ार हो तुम
किसी रोज़
अपने बगीचे के
किसी भी पौधे से
एक कलम काटकर
मेरे भी सीने मे
बो देना............
(GULZAR SAAB KO JANMDIN KI BAHUT BAHUT BADHAI)

