Wednesday, August 17, 2011

गुलज़ार


तुमने
एक पूरा बगीचा
उगाया हुआ है
अपने भीतर
अपनी बागवानी से
पैदा की हैं
फूलों की नयी नयी किस्में
जादू है तुम्हारे हाथों मे
जो हर बार
फूलों मे
नया रंग भर देता है
कौन सा पानी देते हो इन्हे
कैसी है वो मिट्टी
जहाँ पनपते हैं
ये फूल

तुम
जो भी लिख देते हो
वो फूल सा महकने लगता है
और उसकी वो महक़
इतनी ख़ास होती है
हमारे लिए
कि दुनिया भर के
इत्र
फीके पड़ जाते हैं
उस महक़ के आगे

हो भी क्यूँ ना
सुखन के गुलों के
बादशाह हो तुम
बाकी सब तो सब हैं
मगर गुलज़ार हो तुम

किसी रोज़
अपने बगीचे के
किसी भी पौधे से
एक कलम काटकर
मेरे भी सीने मे
बो देना............

(GULZAR SAAB KO JANMDIN KI BAHUT BAHUT BADHAI)

Tuesday, August 9, 2011

ग़ज़ल

आरज़ूएँ तमाम करता है
मन भी कैसा गुलाम करता है

ख्वाब लाता है हर इक रोज़ नये
सुक़ूँ का क़त्ल-ए-आम करता है

बात जब भी करे तो चिंगारी
गुफ़्तगू कब ये आम करता है

हमे तो पूछता नही दिन भर
वो जो आएँ सलाम करता है

मेरी आँखों से चुराकर नींदें
जाने किस किस के नाम करता है

गर कभी मुश्किलों मे हो जाँ तो
रात दिन राम राम करता है

Tuesday, July 26, 2011

मगर सूरज चाय नही पीता

हम तो उठते ही
सुबह सुबह पी लेते हैं चाय
करने के लिए दूर
रात की खुमारी को

मगर सूरज
चाय नही पीता
तो जानती हो
वो कैसे भगाता है
अपनी अधखुली आँखों से
बची-खुची नींद को
उठने के साथ साथ
वो सबसे पहले चूमता है
तुम्हारा माथा

अब समझ आया
कि अभी जब
सुस्ता ही रहा होता है
अंधेरा
मोहल्ले के बाकी घरों मे
तो कैसे तुम्हारी खिड़की पर
खेलने लगती हैं
ऊषा की किरणें

क्योंकि
तुमसे ही पाता है
सूरज
अंधकार से
लड़ने की ऊर्जा

Sunday, June 26, 2011

ग़ज़ल

होश की देहरी पार हुई कब क्या मालूम
उनसे आँखें चार हुई कब क्या मालूम

जिस सूरत पर मर बैठे हम क्या जानें
क्या थे उसके ज़ात-ओ-मज़हब क्या मालूम

यूँ तो याद नही आता है गुनाह कोई
रूठ गया क्यों मुझसे वो रब क्या मालूम

याद है बस इतना कि तू था ख्वाबों मे
कैसे गुज़री रात कहाँ कब क्या मालूम

चैन की नींदें होश के छींटें और सुकून
कैसे उसने लूटा ये सब क्या मालूम

धुन जब लागी यार से जाके मिलने की
कैसे दरिया पार हुआ कब क्या मालूम

Sunday, March 27, 2011

जीवन-चक्र

होश एक कीड़ा है
और नींद छिपकली
मौका पाते ही
निगल जाती है
चट से

मगर कभी कभी
जब होश पी लेता है
तुम्हारी याद
तो बिचारी छिपकली
लाख पैतरों के बावज़ूद
छू भी नही पाती
उस कीड़े की परछाईं को

सुबह होने तक
भूख से तड़प कर
दम तोड़ चुकी होती है
बिचारी छिपकली

कभी कभी
मुझे डर लगने लगता है
कि कहीं तुम्हारी याद
फेरबदल ना कर दे
होश,नींद और मेरे
जीवन-चक्र मे

Friday, March 18, 2011

अमन के रंग से रंग दें चलो इस बार की होली


अमन के रंग से रंग दें
चलो इस बार की होली
मिटा कर भेद मिल जाएँ
कोई मज़हब हो या बोली

करें आओ दुआ मिलकर
क़ि इस धरती के सीने पर
खिलें हों फूल हर ज़ानिब
ना हो बंदूक ना गोली

मिटा दो दाग नफ़रत के
उड़ा दो रंग खुशियों के
लगा दो सबके माथे पर
गुलाल-ए-इश्क़ की रोली

अमन के रंग से रंग दें
चलो इस बार की होली

Wednesday, March 2, 2011

नींदें


बचपन की नींदें भी
कितनी मीठी हुआ करती थीं
आँखें मूंद लो तो पिछला सब गुम
और फिर एक
बिल्कुल नया ख्वाब उतरता था
रंग-बिरंगे होते थे जिसके पंख
जो काली नींद को
कभी लाल,कभी हरा
तो कभी
गुलाबी रंग दिया करते थे

आँखों के ऊपर
ऐसे मिंच जाती थी पलकें
कि बाहरी दुनिया की
एक भी चीज़
दाखिल नही हो पाती थी
हमारी ख्वाबगाह मे

ख्वाब के बाद
जब अगले रोज़
खुलती थी आँखें
तो गुज़रे दिन के
सारे तजुर्बो को
एक कोने मे समेटकर
दिमाग़ की तख़्ती
फिर से हो जाती थी ताज़ा
इस रोज़ के
नये तजुर्बो के
लिखे जाने के लिए

मगर जैसे जैसे
बढ़ी उम्र
ढीली पड़ती गयी
आँख से
पलकों की पकड़
और एक एक कर
सारी हक़ीक़तें
घुस गयीं भीतर

धीरे धीरे
पूरी ख्वाबगाह
दब गयी है
हक़ीक़त की
गर्द के नीचे

और अब तो
ये है आलम
कि खुली आँख से ही
सो जाते हैं हम
और बजता रहता है
हक़ीक़तों का शोर
हमारी नींद मे भी