हम तो उठते ही
सुबह सुबह पी लेते हैं चाय
करने के लिए दूर
रात की खुमारी को
मगर सूरज
चाय नही पीता
तो जानती हो
वो कैसे भगाता है
अपनी अधखुली आँखों से
बची-खुची नींद को
उठने के साथ साथ
वो सबसे पहले चूमता है
तुम्हारा माथा
अब समझ आया
कि अभी जब
सुस्ता ही रहा होता है
अंधेरा
मोहल्ले के बाकी घरों मे
तो कैसे तुम्हारी खिड़की पर
खेलने लगती हैं
ऊषा की किरणें
क्योंकि
तुमसे ही पाता है
सूरज
अंधकार से
लड़ने की ऊर्जा
Tuesday, July 26, 2011
Sunday, June 26, 2011
ग़ज़ल
होश की देहरी पार हुई कब क्या मालूम
उनसे आँखें चार हुई कब क्या मालूम
जिस सूरत पर मर बैठे हम क्या जानें
क्या थे उसके ज़ात-ओ-मज़हब क्या मालूम
यूँ तो याद नही आता है गुनाह कोई
रूठ गया क्यों मुझसे वो रब क्या मालूम
याद है बस इतना कि तू था ख्वाबों मे
कैसे गुज़री रात कहाँ कब क्या मालूम
चैन की नींदें होश के छींटें और सुकून
कैसे उसने लूटा ये सब क्या मालूम
धुन जब लागी यार से जाके मिलने की
कैसे दरिया पार हुआ कब क्या मालूम
उनसे आँखें चार हुई कब क्या मालूम
जिस सूरत पर मर बैठे हम क्या जानें
क्या थे उसके ज़ात-ओ-मज़हब क्या मालूम
यूँ तो याद नही आता है गुनाह कोई
रूठ गया क्यों मुझसे वो रब क्या मालूम
याद है बस इतना कि तू था ख्वाबों मे
कैसे गुज़री रात कहाँ कब क्या मालूम
चैन की नींदें होश के छींटें और सुकून
कैसे उसने लूटा ये सब क्या मालूम
धुन जब लागी यार से जाके मिलने की
कैसे दरिया पार हुआ कब क्या मालूम
Sunday, March 27, 2011
जीवन-चक्र
होश एक कीड़ा है
और नींद छिपकली
मौका पाते ही
निगल जाती है
चट से
मगर कभी कभी
जब होश पी लेता है
तुम्हारी याद
तो बिचारी छिपकली
लाख पैतरों के बावज़ूद
छू भी नही पाती
उस कीड़े की परछाईं को
सुबह होने तक
भूख से तड़प कर
दम तोड़ चुकी होती है
बिचारी छिपकली
कभी कभी
मुझे डर लगने लगता है
कि कहीं तुम्हारी याद
फेरबदल ना कर दे
होश,नींद और मेरे
जीवन-चक्र मे
और नींद छिपकली
मौका पाते ही
निगल जाती है
चट से
मगर कभी कभी
जब होश पी लेता है
तुम्हारी याद
तो बिचारी छिपकली
लाख पैतरों के बावज़ूद
छू भी नही पाती
उस कीड़े की परछाईं को
सुबह होने तक
भूख से तड़प कर
दम तोड़ चुकी होती है
बिचारी छिपकली
कभी कभी
मुझे डर लगने लगता है
कि कहीं तुम्हारी याद
फेरबदल ना कर दे
होश,नींद और मेरे
जीवन-चक्र मे
Friday, March 18, 2011
अमन के रंग से रंग दें चलो इस बार की होली
Wednesday, March 2, 2011
नींदें

बचपन की नींदें भी
कितनी मीठी हुआ करती थीं
आँखें मूंद लो तो पिछला सब गुम
और फिर एक
बिल्कुल नया ख्वाब उतरता था
रंग-बिरंगे होते थे जिसके पंख
जो काली नींद को
कभी लाल,कभी हरा
तो कभी
गुलाबी रंग दिया करते थे
आँखों के ऊपर
ऐसे मिंच जाती थी पलकें
कि बाहरी दुनिया की
एक भी चीज़
दाखिल नही हो पाती थी
हमारी ख्वाबगाह मे
ख्वाब के बाद
जब अगले रोज़
खुलती थी आँखें
तो गुज़रे दिन के
सारे तजुर्बो को
एक कोने मे समेटकर
दिमाग़ की तख़्ती
फिर से हो जाती थी ताज़ा
इस रोज़ के
नये तजुर्बो के
लिखे जाने के लिए
मगर जैसे जैसे
बढ़ी उम्र
ढीली पड़ती गयी
आँख से
पलकों की पकड़
और एक एक कर
सारी हक़ीक़तें
घुस गयीं भीतर
धीरे धीरे
पूरी ख्वाबगाह
दब गयी है
हक़ीक़त की
गर्द के नीचे
और अब तो
ये है आलम
कि खुली आँख से ही
सो जाते हैं हम
और बजता रहता है
हक़ीक़तों का शोर
हमारी नींद मे भी
Friday, February 25, 2011
देव आनंद (बॉलीवुड series)

उत्साह का
अथाह सोता है
तुम्हारे भीतर
जिसके सामने
खुद वक़्त भी
हो जाता है नतमस्तक
क्योंकि
तुम्हारी जीवंतता मे तो
वो भी नही पैदा कर सका
एक भी झुर्री
सिनेमा के उस छोर से
इस छोर तक
किसी गाइड की तरह
तुम्हारी उपस्थिति
जीने की जिजीविषा
पैदा करती है
हमारे भीतर
रुपहले पर्दे पर
अपने ही अंदाज़ मे
निभाए हुए
तुम्हारे किरदारों को देखना
हर बार
भर जाता है हमे
आनंद से भरपूर
अनुभवों से
जीवन के
इस अथक प्रेम पुजारी
देव आनंद साहब को
मेरा सलाम
Wednesday, February 23, 2011
मधुबाला(१४/०२/१९३३-२३/०२/१९६९) (बॉलीवुड series)

यूँ तो
हर तरह की भूमिकाएँ
की हैं तुमने
मगर इतने दशकों बाद भी
तुम्हारी जो तस्वीर
अभी तक बूढ़ी नही हुई
और ज़िंदा है
हमारी याददाश्त मे
अपने चिर यौवन के साथ
वो तुम्हारे
होंठों के कोनो से
छलकती हुई
मुस्कान की है
तमाम रंग और तकनीकें
जो ईज़ाद हुए
तुम्हारे जाने के बाद
वो सब
पड़ जाते हैं फीके
तुम्हारी एक
भरपूर ब्लॅक एंड व्हाइट
मुस्कान के आगे
Subscribe to:
Posts (Atom)
